Archive for कृष्ण

मैं बिरहन बैठी

यह सुमधुर भजन मीना कपूर ने 1948  में बनी फिल्म गोपीनाथ में गाया था,  फिल्म के संगीतकार थे नीनू मजूमदार। मीरां बाई के सुन्दर भजन का आनन्द लेने के लिये उपर दी गई लिंक पर क्लिक करें। 

मैं बिरहिन बैठी जागूं; जगत सब सोवे री आली 

दुल्हन बैठी रंगमहल में मोतियन की लड़ पोवे

एक दुल्हन हम ऐसी देखी अंसुवन माला पोवे

री मैं बिरहिन बैठी…..

तारे गिन गिन रैन बिहानी सुख: की घड़ी कब आवे

मीरा के प्रभू गिरधर नागर जब मोहे दरस दिखावे

मैं बिरहिन बैठी……

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जागो बंसी वारे

जागो बंसी वारे जागो मोरे ललन
रजनी बीती भोर भयो है घर घर खुले किवारे
गोपी दही मथत सुनियत है कंगना के झनकारे
उठो लालजी भोर भयो है सुर नर ठाढ़े द्वारे ।
ग्वाल बाल सब करत कोलाहल जय जय सबद उचारे ।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर शरण आया कूं तारे ॥

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बादल देखी डरी

बादल देख डरी हो, स्याम, मैं बादल देख डरी ।
श्याम मैं बादल देख डरी ।
काली-पीली घटा ऊमड़ी बरस्यो एक घरी ।
जित जाऊं तित पाणी पाणी हुई सब भोम हरी ॥
जाके पिया परदेस बसत है भीजे बाहर खरी ।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर  कीजो प्रीत खरी ।
श्याम मैं बादल देख डरी ।

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मेरे तो गिरधर गोपाल

मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई
जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई
तात मात भ्रात बंधु आपनो न कोई
छांड़ी दई कुलकी कानि कहा करिहै कोई
संतन ढिग बैठि बैठि लोक लाज खोई
चुनरी के किये टूक ओढ़ लीन्ही लोई
मोती मूंगे उतार बनमाला पोई
अंसुवन जल सीचि सीचि प्रेम बेलि बोई
अब तो बेल फैल गई आंनद फल होई 

दूध की मथनियां बड़े प्रेम से बिलोई
माखन जब काढ़ि लियो छाछ पिये कोई
भगति देखि राजी हुई जगत देखि रोई
दासी मीरा लाल गिरधर तारो अब मोही 

शब्दार्थ:

कानि- इज्जत, मान, लाज, परंपरा

संतन ढिग- संतों के साथ बैठ कर ( यहा मीरां रैदास के बारे में कहना चाहती है जो जन्म से चमार थे, जूते बनाते हुए भजन गाते थे,परन्तु बहुत ही माने हुए विद्वान संत थे)

लोई- एक प्रकार का कंबल

मथनियां: एक प्रकार का पात्र जिसमें गाँवों में आज भी दही बिलो कर मक्खन निकाला जाता है।

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