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राम रतन धन पायो

पायो जी मैने  राम रतन धन पायो   

   वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु, किरपा कर अपनायो
जनम जनम की पूंजी पाई, जग में सभी खोवायो
खरचे ना खूटे, चोर न लूटे, दिन-दिन बढ़त सवायो
सत की नाव खेवटिया सतगुरु, भवसागर तर आयो
 मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरष हरष जस गायो

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कुछ मेरी तरफ़ से

मीरां बाई किसी भी हिन्दी प्रेमी के लिये अन्जाना नाम नहीं है। राजस्थान के मेड़ता की इन महान कवियत्री, संत, गायिका ने कृष्ण की भक्ति में डूब कर जो रचनायें हमें दी है, वह अनमोल है।

मीरां बाई की रचनायें शुद्ध सरल राजस्थानी, हिन्दी और गुजराती में है। सामान्य हिन्दी जानने वाला कोई भी इन रचनाओं को आसानी से समझ सकता है।

यह मेरी तरफ़ से एक छोटा सा प्रयास है कि मीरां बाई की रचनाओं को एकत्रित कर आप के सामने एक संकलन प्रस्तुत कर रही हूँ, मेरे इस  प्रयास में आप सबके सहयोग की आवश्यकता होगी सो आप इन रचनाओं के अलावा कोई और रचना जानतें हों तो मुझे मेरे मेल पर अवश्य भेजें, यहाँ आप के नाम के साथ प्रकाशित की जायेगी। ( कोई मानदेय की व्यवस्था नहीं है)

व्याकरण कि गल्तियाँ होनी स्वाभाविक है सो आप से अनुरोध है कि उनके लिये आप बेहिचक लिखें।

धन्यवाद

निर्मला सागर

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